मोक्ष बड़ा या देश

मैं बचपन से ही अध्यात्म मार्ग की और आकर्षित रहा हूँ। आध्यत्म पर कई पुस्तकें पढ़ी। संध्या भी करता आया हूँ। मैडिटेशन की मदद से दिमागी शान्ति भी प्राप्त की। लेकिन मेरा लक्ष्य तो उस परम आनंद को प्राप्त करना था जहाँ जाकर मनुष्य केवल्य का अहसास करता है, मोक्ष के करीब पहुँच जाता है, जीवन मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है। अपनी इस यात्रा की गति को तेज करने के लिए मैं विपाश्य्ना का दस दिन का कोर्स करने गया, जहाँ आर्य मौन धारण कर दिन के 12 घंटे सिर्फ ध्यान लगाया जाता है। वहाँ जाकर काफी लाभ मिला। परंतु वहाँ जाकर एक किस्सा सुनने को मिला जिसके कारण मेरा मन अब मोक्ष प्राप्ति का नहीं रहा।

किस्सा कुछ यूं है कि एक क्षत्रिय पराक्रमी राजा महात्मा बुद्ध से प्रभावित हो कर राज पाठ छोड़ जंगल में जाकर मोक्ष या कहें कि बोधिसत्व प्राप्त करने के लिए तपस्या में लीन हो जाता है। एक ही जगह बैठ कर तपस्या करने के कारण उसके चारों और पेड़ पौधे उग आते हैं जिसके कारण वह दिखाई देना बंद हो जाता है। एक दिन वह कुछ हलचल व कुछ मनुष्यों की आवाजें सुनता है। ध्यान देने पर पता चलता है कि उसी के करीब बैठ कर दुश्मन देशों के कुछ राजा मिलकर उसके राज्य पर आक्रमण करने की योजना बना रहे थे। वह चाहता तो अब भी जाकर अपनी सेना को सुचना देकर राज्य को बचा सकता था। लेकिन यह क्या? उनकी क्रूर योजना सुनाने के बाद भी ना ही क्षत्रिय राजा की भुजाएँ फड़कती हैं ना ही उसकी इच्छा अपनी साधना को छोड़ने की हुई। वह समझ जाता है कि उसके क्षत्रियत्व का लोप हो चुका है, अब संसार की किसी भी भौतिक वस्तु से उसे कोई मोह नहीं है। सभी प्राणियों के प्रति उसके मन में अब केवल स्नेह है। वह अब मोक्ष के करीब है। 

बस यहीं से मेरा मन विचलित हो गया। मोक्ष सर्वोच्च लक्ष्य है, परंतु यदि उसके लिए देश हित के विचार का त्याग करना पड़े तो मैं ऐसे मोक्षमार्ग का त्याग करता हूँ। मेरे लिए शायद मोक्ष वैसे भी असम्भव था। लेकिन एक इतिहास पुरुष हुए जिन्होंने स्वयं मोक्ष को देश के लिए त्याग दिया। वे महापुरुष थे ‘चाणक्य’।

ब्राह्मण कुल में जन्मे चाणक्य बचपन से ही तीक्ष्ण बुद्धि थे। शास्त्रों की शिक्षा शीघ्र पूर्ण कर वे स्वयं ग्रन्थ रचना में लग गए। संध्या व ध्यान वो नियमित करते थे। धीरे धीरे वे मोक्ष मार्ग पर अग्रसर हुए। लेकिन तभी देश की सीमा पर यवनों (ग्रीक्स) की आहट सुनाई दी। चाणक्य मोक्ष के बेहद करीब थे। वे जानते थे कि यदि इस समय वे मोक्षमार्ग पर चलते रहे तो उनका मन प्रेम व करुणा से भर जाएगा। उसके बाद उन्हें यवनों पर भी प्रेम आएगा, ऐसे में उन्हें देश से बाहर करने के बारे में कौन सोचेगा? चाणक्य के सामने स्वयं के मोक्ष और देश हित के बीच किसी एक को चुनना था। उन्होंने देश  को चुना और सोचा कि मोक्ष को तो मैं अगले जन्म में भी साध लूंगा, और निकल पड़े देश को यवनों के खिलाफ एकजुट करने में। आगे की कहानी हम सब को ज्ञात है। 

आजकल बहुत से छोटे छोटे सम्प्रदाय खुल गए हैं जो अलग अलग विधि से आपको मोक्ष, केवल्य, परमानंद व साक्षात्कार तक पहुँचाने का दम भरते हैं। पतंजलि के अष्टांयोग की आखरी सीढ़ी भी समाधी है। परंतु ऐसे किसी भी मार्ग पर चलने से पहले आप अपने गुरु से अवश्य पूछिये कि ‘राष्ट्रवाद (नेशनलिस्म) पर आपका क्या विचार है?’ यदि आपके संप्रदाय या गुरु नेशनलिस्म को फालतू की चीज़ बताते हैं या राष्ट्रवाद को मोक्ष की बाधा बताते हैं तो यकीन मानिए ऐसा मोक्षमार्ग अनुकरणीय नहीं है। फुलस्टॉप।। बात खत्म।।

– Pushpender Singh Parmar

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कोई हिन्दू विरोध नहीं, केवल निजी स्वार्थ है कारण

केरल में कांग्रेसियों द्वारा मोदी विरोध में गाएँ के बछड़े को काटे जाने के बाद से बड़ा हंगामा मचा है। लगभग सभी वर्गों से कांग्रेस को गालियाँ मिल रही हैं, कोई इस घटना को कांग्रेस के ताबूत में आखरी कील बता रहा है, तो कोई कांग्रेस को हिन्दू विरोधी पार्टी बता रहा है। यह सभी बातें सही भी हैं। लेकिन हमें अपने विश्लेषण को यही विराम नहीं देना चाहिए। क्यों भारत की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी जिसका की चुनाव निशान कभी गाएं व बछड़े की जोड़ी हुआ करता था ने सरे बाज़ार ऐसा कुकृत्य किया। जो काम कभी अंग्रेजो ने भी नहीं किया वो काम कांग्रेस ने मोदी राज में क्यों किया। गहरे में जाकर विश्लेषण करें तो हमें पता लगेगा का यह कोई हिन्दू विरोधी मानसिकता नहीं है अपितु व्यक्ति विशेष की पूजा द्वारा अपना स्वार्थ साधने की अंधी दौड़ है। यहाँ हिन्दू ही अपने स्वार्थ के कारण किसी विशेष व्यक्ति की गुलामी को अपने भविष्य का आश्रय मान लेता है और धर्म विरोधी, न्याय विरोधी, हिन्दू विरोधी हो जाता है। चलिए इस बात तो और अच्छी तरह समझने के लिए कुछ उदाहरणों को देखते हैं।

राजस्थान, मध्यप्रदेश व हरियाणा में एक परियावर्ण प्रेमी जाति है जो अपने संस्थापक गुरु जम्भेश्वर जी के बताए 29 नियमों पर चलने के कारण बिश्नोई (बीस + नो) कहलाते हैं। गुरु जम्भेश्वर जी ने 27 वर्ष की आयु तक गाएँ चराई। अपने दिए  इन 29 नियमों में से 8 नियम जैविक (पेड़ पोधों) व जानवरों के रक्षा के लिए हैं और 7 नियम धर्मानुसार समाज की रक्षा के लिए हैं। लेकिन आज हरियाणा में बसने वाला बिश्नोई समाज कांग्रेस के खेमे में खड़ा दिखाई देता है क्योंकि अभी कुछ दिन पहले कुलदीप बिश्नोई (भजनलाल के बेटे) ने कांग्रेस पार्टी ज्वाइन कर ली थी। आज बिश्नोई समाज जो अपने नियमो के मुताबिक एक गौरक्षक समाज है गौहत्यारी कांग्रेस का समर्थन कर रहा है। अंधभक्ति इतनी है कि पूछिए मत। कहा जाता है कि एक बार किसी पार्टी में भजन लाल ने वेटर को कहा कि ”मैं वही खाऊंगा जो राजीव गाँधी जी खा रहे हैं” उस समय राजीव जी की प्लेट में बीफ (गौ मांस) था। पर चाटुकारिता की सभी हदें पार करके भजनलाल जी ने गोमांस खा लिया। इस खबर के बाहर आने के बाद भी बिश्नोई समाज का समर्थन उन्हें मिलता रहा। आज उनके बेटे कुलदीप बिश्नोई भी उसी अंध समर्थन के उतराधिकारी बन बैठे है। अब देखा जाए तो आज बिश्नोई समाज कांग्रेस का साथ देकर गोहत्या का मूक समर्थन कर रहा है पर इसका मतलब यह नहीं कि वे हिन्दू विरोधी हो गए हैं। बस व्यक्तिविशेष की भक्ति में ही लीन हैं।

यही बात आज के जाट समाज पर भी लागू होती है। जो आज बीजेपी विरोध में इतने अंधे हो गए हैं कि कुछ राष्ट्रिय मुद्दों पर विपक्ष के साथ खड़े दिखाई देते हैं। बीजेपी से उनकी नारजगी इस बात को लेकर भी है कि आज जाट बाहुल्य हरियाणा का मुख्यमंत्री एक नॉन-जाट है। इसी जाट कुल ने बारहवीं शताब्दी में एक गौरक्षक वीर को जन्म दिया था। जो वर्तमान में एक लोकदेवता माने जाते हैं। उनका नाम था ‘वीर तेजाजी’। उन्होंने गौ रक्षा करते हुए अपने प्राण त्याग दिए थे। जाट समाज व निम्न वर्ग उनकी बहुत इज्ज़त करता है। उनकी पूजा की जाती है। लेकिन आज यही जाट समाज गौरक्षक तेजाजी को भूल कर गौहत्यारी कांग्रेस पार्टी के उस ‘भूपेन्द्र सिंह हुड्डा’ को अपना नेता मानता है जो केरल गौहत्या काण्ड पर मौन हैं। यहाँ भी अर्थ यह नहीं है कि हर हुड्डा या चौटाला समर्थक जाट भाई हिन्दू विरोधी हो गया है। बस देशप्रेम से कहीं अधिक व्यक्ति विशेष या कहें कि जाति विशेष का मोह हो गया है। 

अब गौपालक ‘यदुकुल’ यानि यादवों के बात की जाए। जो अपने आप को भगवान् कृष्ण की संतान मानते हैं। गोपालकों में सबसे अग्रिणी हैं। वे यादव आज लालू प्रसाद यादव में एक देवता को देखते हैं। वो लालू प्रसाद यादव जिन्होंने बीफ मुद्दे पर सवाल के जवाब में कहा था कि “हिन्दू भी तो बीफ खाता है।” लालू प्रसाद यादव हर मुद्दे पर कांग्रेस के साथ खड़े दिखाई देते हैं। असल में लालू व कांग्रेस के विचारों में इतनी समानता है कि कांग्रेस ने कभी लालू को अलग माना ही नहीं। अब यहाँ अर्थ यह नहीं लगाना चाहिए की हर लालू समर्थक यादव हिन्दू विरोधी है। नहीं!! यहाँ भी बस वही स्वार्थवश जाति समीकरण धर्म से बड़ा हो जाता है।

कांग्रेसियों ने भी जो काम केरल में किया है वो सिर्फ हाई कमान को खुश करने के लिए किया है। उन्हें पता है कि इस बात से सोनिया जी खुश होंगी भले ही मीडिया में वो इस काण्ड कि भर्तसन करें लेकीन वे एक दिन उन्हें इसका इनाम अवश्य देंगी। यहाँ कोई हिन्दू विरोध नहीं है बस कोरा निजी स्वार्थ है। आपको क्या लगता है जगदीश टाईटलर या सज्जन कुमार को कोई निजी रंजिश थी सिक्खों से? नहीं, उन्होंने तो यह सब केवल हाई कमान को खुश करने के लिए किया था। जिसका इनाम भी बाद में उन्हें दिया गया।

हिन्दुओं में ऐसे अनेको उदाहरण और भी गिनाए जा सकते हैं। आज भारत देश के एक कोने में सरे आम चुनौती देकर कोई गौ माता की हत्या केवल इसलिए कर पाता है क्योंकि हर हिन्दू अपनी जाति की पहचान को सबसे आगे रखता है। वो अपने आप को राजपूत, ब्राह्मण, जाट, बनिया, यादव पहले मानता है फिर बाद में अपने आप को हिन्दू मानता है। अपने स्वार्थ को पहले सिद्ध करता है। इस स्वार्थ सिद्धि के रास्ते में यदि धर्म की दीवार आती है तो उसे भी बिना संकोच लांघ जाता है।

उम्र भर ग़ालिब यहि भूल करता रहा, 
धूल चेहरे पर थी और आईना साफ करता रहा।

(नोट: उपरोक्त जाति के सन्दर्भ में दिए गए तर्क उस जाति के हर व्यक्ति पर लागु नहीं होते।)

– पुष्पेन्द्र सिंह परमार

आधुनिक ‘ताम्रवर्ण’

​एक बहुत पुरानी कहानी याद आती है। यह उस समय की बात है जब आधुनिकता ने दुनिया में कदम नहीं रखा था। तब सड़के नहीं थी। एक गाँव से दुसरे गाँव जाने के लिए घने जंगलों को पार कर के जाना पड़ता था। जंगल में डाकुओं और चोर लुटेरों का खतरा बना रहता था। 

ऐसे में तीन व्यापारियों को एक लम्बा जंगल पार कर एक गाँव से दुसरे गाँव में जाना था। ये तीनो व्यापारी अपने अपने धंधे से मुनाफा कमा कर अपने गाँव वापस जा रहे थे। धन काफी था इसलिए व्यापारियों ने अपने सारे धन को बेशकीमती रत्नों व हीरों में तब्दील कर लिया था ताकि सफ़र में आसानी हो। लेकिन अब जो आखरी गाँव था, जिसे पार करके उन्हें अपने गाँव पहुँचना था, उसके बीच में एक बड़ा सघन जंगल पड़ता था, उसे पार करना बड़ा ही खतरनाक था। उस जंगल के लुटेरे अपनी क्रूरता के लिए बदनाम थे। वे बड़े ही धूर्त व नृशंस हत्यारे थे।

ऐसे में उन तीनों ने उसी गाँव के एक स्वर्ण व्यापारी से इस सन्दर्भ में सहायता मांगी। स्वर्ण व्यापारी ने उन्हें अपने एक नौकर ‘ताम्रवर्ण’ के बारे में बताया जो बड़ा ही चतुर व बुद्धिमान था। उसने कहा कि मेरा नौकर जरूर कोई न कोई ऐसी युक्ति निकाल लेगा जिसे से आप का काम हो जाएगा। ताम्रवर्ण जितना चतुर था उस से कहीं अधिक कपटी और लालची था। लेकिन अपने व्यक्तित्व के इस भाग को उसने कभी बाहर उजागर नहीं होने दिया था। सभी उसे साफ़ दिल का ही समझते थे। 

ताम्रवर्ण ने तीनो व्यापरियों से कहा कि “आप केलों में अपने हीरे व रत्न लगा कर खा जाइए। जब आप जंगल पार करेंगे तो आपके हाथ खली होंगे, क्योंकि रत्न आपके पेट में होंगे और लुटेरे आपको छोड़ देंगे। मैं भी आपके साथ चलूँगा और आपकी सुरक्षा को सुनिश्चित कर के ही लोटूंगा।” व्यापारियों को उपाय पसंद आ गया और वे ताम्रवर्ण की बुद्धिमानी और भलमनसाई के कायल हो गए। लेकिन असल में ताम्रवर्ण ने सोच रखा था कि जंगल में इन तीनो को मार कर इनका पेट चीर कर वो सारे हीरे स्वयं ले लेगा और किसी को कानो कान खबर भी नहीं होगी। ताम्रवर्ण की योजना पूरी तरह से पुख्ता थी।  

निश्चित दिन आने पर वह चारों (तीन व्यापारी व ताम्रवर्ण) अपने गंतव्य के लिए निकल पड़ते हैं। व्यापारियों के पेट में रत्न थे और ताम्रवर्ण के दिमाग में हत्या कर धन प्राप्ति के इरादे। वे सभी पैदल चले जा रहे थे कि तभी अचानक हथियारबंद लूटरों ने उन्हें घेर लिया। ताम्रवर्ण भी हक्का बक्का रह गया था। क्योंकि उसकी योजना को अंजाम देने से पहले ही लुटेरे आ धमके थे। उसे इसकी आशा नहीं थी। लुटेरे चारों की तलाशी लेते हैं। किसी के पास से भी कुछ नहीं निकलता। लुटेरों का सरदार गुस्से में पूछता है कि “बताओ माल कहाँ है?” तभी एक लुटेरा कहता है कि “सरदार! ये व्यापारी लोग बड़े चालक हो गए हैं। मैंने सुना है कि आजकल ये लोग अपने सभी रत्न व हीरे अपने पेट में लेकर चलते हैं।” सरदार ने तुरंत आदेश दिया का चारों का पेट चीर कर देखा जाए। चारों के चहरों पर हवाइयाँ उड़ने लगी। ताम्रवर्ण ने तुरन्त स्थिति को भांप लिया था। उसे पता चल गया था कि आज उसका अंत तो निश्चित है। वो जान गया था कि अगर इन तीनो के पेट से रत्न मिलेंगे तो लुटेरे उसका पेट भी जरूर चीर कर देखेंगे, भले ही वो कितनी भी विनीति कर ले, कितना भी सच बोल ले। लेकिन जीवन के इस अंतिम क्षण में उसने अपनी बुद्धि को दोड़ाया और मन ही मन गणना की कि “मेरा मरना तो आज निश्चित है; क्यों न इन तीनों की जान बचाने का एक प्रयास किया जाए। शायद अगले जन्म में यह कर्म काम आए।” 
उसने लुटेरों के सरदार से हाथ जोड़ कर कहा कि “हे! वीर, आप क्यों अपने सर पर हम चार निर्दोष लोगों कि हत्या का भार ढोते हैं। हम चारों एक ही गाँव के हैं, एक ही आर्थिक वर्ग से आते हैं। हमारे पेट में कुछ भी नहीं है। इस बात को साबित करने के लिए आप को चार लोगों कि हत्या करने कि आवश्यकता नहीं है। आप केवल मेरी हत्या कर मेरे पेट में हीरों व रत्नों को टटोल सकते हैं। यदि मेरे पेट में कुछ नहीं मिलेगा तो आप जान जाएँगे कि इन तीनों के पेट से भी कुछ नहीं मिलेगा। इस तरह आप केवल एक हत्या कर के अपनी शंका शांत कर सकते हैं। और चार निर्दोष हत्याओं के पाप से भी बच जाएंगे।” सरदार को बात समझ आ गई। मुखिया लुटेरे ने एक ही वार में ताम्रवर्ण के सिर को धड से अलग कर दिया और उसके पेट को चीर कर देखा। कुछ न मिलने पर तीनो व्यापारियों को जाने दिया। 

तीनो व्यापरियों के लिए ताम्रवर्ण सदा के लिए महान बन गया था। उन्होंने अपने गाँव जाकर ताम्रवर्ण के नाम से धर्मशाला व विद्यालय बनवा दिए, फिर भी वे अपने आप को ताम्रवर्ण के कर्ज से मुक्त नहीं पाते थे। ताम्रवर्ण उनके लिए देव तुल्य हो गया था। एक कपटी व लालची व्यक्ति ने अपने अंतिम समय में एक स्वार्थरहित काम कर दिया था जिसके कारण उसके पहले सभी बुरे कर्म धुल गए थे। कर्म के खाते में उसका बैलेंस सकारात्मक हो गया था। वो महान बन गया था।    

भारत देश के वर्तमान समय के सबसे बड़े व महंगे अधिवक्ता (वकील) हरीश साल्वे पर भी अपनी आत्मा को बेच कर बस पैसों के लिए हाई प्रोफाइल केस लड़ने का आरोप लगता रहता है। उन्हें राष्ट्रवादी लोग एक अनैतिक अधिवक्ता के आरोपों से नवाजते हैं। क्योंकि साल्वे गुजरात दंगों में पीडित पक्ष बिलकिस बानो और रैश ड्राइविंग केस में सलमान खान के वकील रह चुके हैं। लेकिन हाल ही में उन्होंने इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ़ जस्टिस (ICJ) में कुलभूषण यादव का प्रतिनिधित्व भारत की और से किया है। कुलभूषण यादव जिन्हें पाकिस्तान ने भारत का जासूस मान कर फांसी की सजा सुना दी है। वो भारत की और से अंतर्राष्ट्रीय मंच पर कुलभूषण के वकील हैं। यहाँ बड़ी बात यह है कि साल्वे ने अपनी इस सेवा के लिए भारत सरकार से मात्र एक रुपया मेहनताना लिया है। 

पाकिस्तान द्वारा गैर कानूनी तरीके से फंसाए गए भारतीय नागरिक कुलभूषण यादव का केस अब कोई मामूली राजदूतीय स्तर की माथापच्ची नहीं रह गया है। अब यह केस अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में भारतीय अस्मिता का पर्याय बन चूका है। क्योंकि अगर भारत यह केस हार जाता है तो पाकिस्तान एक तरह से यह साबित करने में कामयाब हो जाएगा कि भारतीय सरकार पकिस्तान में हो रही आतंकवादी गतिविधियों में संलिप्त है। जोकि पूरी तरह से झूठ होगा। ऐसे नाजुक मामले में हर भारतीय नागरिक अपने देश के सर्वश्रेष्ठ वकील को अंतर्राष्ट्रीय कोर्ट में पैरवी करते देख आश्वस्त है कि सरकारी प्रयासों में कोई ढील नहीं है। वहीँ विदेश मंत्री श्रीमती सुषमा स्वराज जी द्वारा यह खुलासा कि इस प्रोफेशनल सर्विस के लिए हरीश साल्वे ने सरकार से केवल एक रुपया चार्ज किया हैं, बड़ी साकारात्मक खबर लगती है। 

भविष्य में हरीश साल्वे क्या-क्या और कैसे-कैसे केस लड़ते हैं वो हम अभी नहीं बता सकते लेकिन यह बात तय है कि उनके इस काम से उनके प्रति जनता के दृष्टिकोण में एक सकरात्मकता आई है। आज उन्होंने देश के बेटे होने के अपने फ़र्ज़ को निभाया है। भले ताम्रवर्ण की तरह उनकी मंशा कुछ भी रही हो।

– Pushpender Singh Parmar

केहरसिंह फ़ौजी बनाम जज साहब

वो बिना हेलमेट के बाइक चला रहा था। पुलिस वाले ने रोका, कहा “हेलमेट कहाँ है?” उसने बोला भूल गया। 
पुलिस वाला:  क्या नाम है? काम क्या करते हो?

बाइक सवार:  केहर सिंह नाम है और मैं एक फौजी हूँ।

पुलिस वाला:  अच्छा कोई बात नहीं जाओ, आगे से हेलमेट पहन कर बाइक चलाना। 

फ़ौजी:  नहीं भाई, आप अपना काम करो। मैंने गलती की है मेरा चालान काटो।

पुलिस वाला:  ठीक है, अगर ऐसी ही बात है तो निकालो 100 रु और पर्ची लेकर जाओ। 

फ़ौजी:  नहीं, यहाँ नहीं भुगतना चालान। मैं अदालत में ही जाकर चालान भुगतुंगा।
#अदालत
संतरी:  केहर सिंह हज़ीर हो।

जज:  हांजी, मिस्टर केहर सिंह आप 100 रु का चालान भर दीजिये। 

केहर:  नहीं जनाब, यह कोई तरीका नहीं हुआ। आपने मेरी दलील तो सुनी ही नहीं। 

जज:  अच्छा बताओ क्यों तुम्हें 100 रु का फाइन न किया जाए?

केहर:  जनाब, 100 रु का फाइन थोड़ा कम है इसे आप 335 रु का कर दीजिए। 

जज:  क्यों? और 335 का ही क्यों?

केहर:  क्योंकि मुझे 100 रु कम लगता है और 336 रु ज्यादा ही नाइन्साफ़ी जो जाएगी। 
(वहाँ खड़ी भीड़ हंसती है)
जज:  (काठ का हथौड़ा मेज पर मारते हुए) शांति, शांति बनाए रखिये। 

केहर:  जनाब एक और सलाह है, ये हथौड़ा काठ की बजाए स्टील का होना चाहिए आवाज ज्यादा होगी। एक और बात, यहाँ इस कमरे में भीड़ बहुत ज्यादा है। आप एक आर्डर पास कर दीजिए की कल से यहाँ ज्यादा से ज्यादा बस 127 लोग ही आएं। 

जज:  are you lost your mind Mr. Kehar Singh? आप यहाँ अदालत में जोक्स क्रैक कर रहे हैं। आप एक जज को सिखा रहे हैं कि अदालत कैसे चलानी है? कानून क्या होना चाहिए? फैसला क्या करना है? आपको पता भी है हम किस परिस्थिति में काम करते हैं? हमारे ऊपर कितना प्रेशर होता है? और….

केहर:  जनाब! मैं एक फौजी हूँ। अभी कश्मीर में पोस्टेड हूँ। with all due respect sir आपको घण्टा नहीं पता कि प्रेशर क्या होता है। आपका प्रेशर ज्यादा से ज्यादा आपको एक दो घंटे ओवरटाइम करवा देगा। हमारा प्रेशर हमारी और सैंकड़ो और लोगों की जान ले सकता है। 
जनाब, क्षमा कीजिये कि मैंने आपको सलाह दी। जिस काम के लिए आपको ट्रेनिंग दी जाती है, जिस काम में आप माहिर हैं उस काम में मैंने आपको सलाह दी। परन्तु आप भी तो यही करते हैं हमारे साथ…..मसलन…बन्दुक को 90 डिग्री से नीचे कर के चलाओ, असली गन मत चलाओ, पेलेट गन चलाओ, बस घुटनों के नीचे निशाना लगाओ, प्लास्टिक की गौलियाँ इस्तेमाल करो, प्लास्टिक की गोली भी खोखली होनी चाहिए, उसका वजन xyz ग्राम से ज्यादा नो हो। ये क्या बकचोदी है जज साब? क्या आप यहाँ ac रूम में बैठ कर हमें सिखाओगे कि हमें अपना काम कैसे करना है? जिस काम के लिए हम trained हैं, जिन situations  का हमको firsthand experience है आप हमें बताओगे कि उस situation में हमें कैसे react करना चाहिए?

(सन्नाटा)……

~ Pushpender Singh Parmar

रिज़नेबल डाउट

​”Reasonable Doubt” यह कानून का एक ऐसा पेंच है जिसे अपराधी पक्ष के वकील खुल कर इस्तेमाल करते हैं और अपने क्लाइंट को बचा ले जाते हैं। reasonable doubt, यानि “संदेह से परे” का मतलब होता है कि अभुयुक्त को तब तक अपराधी नहीं माना जाएगा जब तक विपक्षी वकील उसका अपराध ‘संदेह से परे’ की हद तक साबित नहीं कर देता। और यदि अपराधी पक्ष के वकील ने सिर्फ एक शक, एक डाउट, एक संदेह जज के दिमाग में डाल दिया कि ‘हो सकता है कि ये अपराधी ना हो’ that there is a reasonable doubt that he/she may not be the criminal, तब… ऐसी स्थिति में जज फैसले तक नहीं पहुँच पाता और अपराधी बच जाता है। 

आपको पता है कि इस्लाम दुनिया का सबसे तेजी से बढ़ता हुआ धर्म है, और इस्लाम ही वो धर्म है जिसमे धर्म परिवर्तन करने वालों की संख्या सबसे कम है। कभी सोचा है कि ऐसा क्यों है। क्योंकि इस्लाम धर्म में रिज़नेबल डाउट को स्थान नहीं दिया गया है। जो भी मुस्लमान है या मुस्लमान बनता है उसे बियॉन्ड डाउट, बिना शक-औ-सूबा यह स्वीकार करना पड़ता है कि एक अल्लाह है जिसने अपनी बातें मुहम्मद (PBUH) तक पहुंचाई, जो कुरान के रूप से हमें मिली हैं। अब आप यदि मुस्लमान हैं तो ना इस कहानी पर और न ही कुरान में लिखी बातों पर शक कर सकते हैं। बात खत्म। हो गया फैसला। आप बन गए सदा के लिए मुस्लमान, सच्चे मुस्लमान। क्योंकि फैसला तब ही होता है जब शक की कोई गुंजाईश ही न बचे। 

अब हिंदुओं के घर में झांक कर देखो। 100 हिंदुओं से पूछो कि “क्या आप मानते हैं कि राम थे?” 50 श्याने आपको मिलेंगे जो कहेंगे कि “नहीं, यह सब कहानी है, मिथक है।” ऐसा इसलिए है कि हमारे हिन्दू समाज में सावल पूछने की आजादी है। शक करने को सही माना जाता है। प्रश्नों को प्रोत्साहित किया जाता है। लेकिन अपनी इस विशेषता के कारण ही आज हिन्दू समाज हाशिये पर है। आज भी बहुत से ऐसे हिन्दू हैं जो कहते हैं कि राम मंदिर का मुद्दा छोड़ देना चाहिए। वो ऐसा इसलिए आसानी से कह पाता है क्योंकि उसे राम के होने पर ही शक है। यह शक हमारे हिन्दू समाज में ही व्यापत अधिक बुद्धिमान ‘समाज’ ने ही पैदा किया है। इस समाज ने वामपंथियों के साथ मिलकर हमारे बच्चों के दिमाग में एक ‘रिज़नेबल डाउट’ पैदा कर दिया है। और जहाँ शक है वहां फैसला नहीं हो सकता। 

गणित में भी जब किसी बात को जान नहीं पाते। कोई हल निकालना मुश्किल होता है तो हम पहले कुछ राशि/अंक ‘मान’ लेते हैं और उसके द्वारा ही उस प्रश्न का हल निकालते हैं। इसे रिवर्स अप्रोच भी कहते हैं। इसलिए “पहले मानो फिर जानो।” आज की पीढ़ी पहले भगवान होने का प्रमाण मांगती है और कहती है कि “मैं पहले जानूँगा, फिर मानूँगा।” यह शक, यह रिज़नेबल डाउट उसे अति बुद्धिमान ‘समाज’ ने दिया है। 

शायद राम मंदिर कभी ना बने। क्योंकि यह लड़ाई अगली पीढ़ी के हाथों में जाती दिखाई दे रही है। और अगली पीढ़ी के दिमाग में हमारे स्कूल की किताबों ने रिज़नेबल डाउट डाल दिया है। अगर यह लड़ाई अगली पीढ़ी तक गई तो मंदिर कभी नहीं बनेगा। यह हमारा कर्तव्य है कि यह मंदिर हमें श्री राम के साक्ष्य के रूप में अगले पीढ़ी को भेंट करना है। 

हिंदुओं में प्रदुषण बढ़ता जा रहा है। 
कमर कस लो। 
यह हमारी आखरी पीढ़ी है जिसने..
राम को पहले माना है फिर जाना है,
और मंदिर हमें ही बनवाना है। 

जय श्री राम।

– Pushpender Singh Parmar

औरत वत्सला है।

वो विधवा थी पर श्रृंगार ऐसा कर के चलती थी कि पूछो मत। बिंदी के सिवाय सब कुछ लगाती थी। पूरी कॉलोनी में उनके चर्चे थे। उनका एक बेटा भी था जो अभी नौंवी कक्षा में था। पति रेलवे में थे उनके गुजर जाने के बाद रेलवे ने उन्हें एक छोटी से नौकरी दे दी थी। 

उनके जलवे अलग ही थे। 1980 के दशक में बॉय कटिंग रखती थी। सभी कालोनी की आंटियां उन्हें ‘परकटी’ कहती थी। ‘गोपाल’ भी उस समय नया नया जवान हुआ था। अभी 16 साल का ही था। लेकिन घर बसाने के सपने देखने शुरू कर दिए थे। गोपाल का आधा दिन आईने के सामने गुजरता था और बाकि आधा परकटी आंटी की गली के चक्कर काटने में। गोपाल का नवव्यस्क मस्तिष्क इस मामले में काम नहीं करता था कि समाज क्या कहेगा? यदि उसके दिल की बात किसी को मालूम हो गई तो? उसे किसी की परवाह नहीं थी। परकटी आंटी को दिन में एक बार देखना उसका जूनून था। 

उस दिन बारिश अच्छी हुई थी। गोपाल स्कूल से लौट रहा था। साइकिल पर ख्वाबो में गुम उसे पता ही नहीं लगा कि अगले मोड़ पर कीचड़ की वजह से कितनी फिसलन थी। अगले ही क्षण जैसे ही वह अगले मोड़ पर मुड़ा साइकिल फिसल गई और गोपाल नीचे। उसी वक्त सामने से आ रहे स्कूटर ने भी टक्कर मार दी। गोपाल का सर मानो खुल गया हो। खून का फव्वारा फूटा। गोपाल दर्द से ज्यादा इस घटना के झटके से स्तब्ध था। वह गुम सा हो गया। भीड़ में से कोई उसकी सहायता को आगे नहीं आ रहा था। खून लगातार बह रहा था। 

तभी एक जानी पहचानी आवाज गोपाल नाम पुकारती है। गोपाल की धुंधली हुई दृष्टि देखती है कि परकटी आंटी भीड़ को चीर पागलों की तरह दौड़ती हुई आ रही थी। परकटी आंटी ने गोपाल का सिर गोद में लेते ही उसका माथा जहाँ से खून बह रहा था उसे अपनी हथेली से दबा लिया। आंटी की रंगीन ड्रेस खून से लथपथ हो गई थी। आंटी चिल्ला रही थी “अरे कोई तो सहायता करो, यह मेरा बेटा है, कोई हॉस्पिटल ले चलो हमें।” गोपाल को अभी तक भी याद है। एक तिपहिया वाहन रुकता है। लोग उसमे उन दोनों को बैठाते हैं। आंटी ने अब भी उसका माथा पकड़ा हुआ था। उसे सीने से लगाया हुआ था। 

गोपाल को टांके लगा कर घर भेज दिया जाता है। परकटी आंटी ही उसे रिक्शा में घर लेकर जाती हैं। गोपाल अब ठीक है। लेकिन एक पहेली उसे समझ नहीं आई कि उसकी वासना कहाँ लुप्त हो गई थी। जब परकटी आंटी ने उसे सीने से लगाया तो उसे ऐसा क्यों लगा कि उसकी माँ ने उसे गोद में ले लिया हो। वात्सल्य की भावना कहाँ से आई। उसका दृष्टिकोण कैसे एक क्षण में बदल गया। क्यों वह अब मातृत्व के शुद्ध भाव से परकटी आंटी को देखता था। 

(2017) आज गोपाल एक रिटायर्ड अफसर है। समय बिताने के लिए कम्युनिटी पार्क में जाता है। वहां बैठा वो आज सुन्दर औरतों को पार्क में व्यायाम करते देख कर मुस्कुराता है। क्योंकि उसने एक बड़ी पहेली बचपन में हल कर ली थी। वो आज जानता है, मानता है, और कई लेख भी लिख चुका है कि महिलाओं का मूल भाव मातृत्व का है। वो चाहें कितनी भी अप्सरा सी दिखें दिल से हर महिला एक ‘माँ’ है। वह ‘माँ’ सिर्फ अपने बच्चे के लिए ही नहीं है। वो हर एक लाचार में अपनी औलाद को देखती है। दुनिया के हर छोटे मोटे दुःख को एक महिला दस गुणा महसूस करती है क्योंकि वह स्वतः ही कल्पना कर बैठती है कि अगर यह मेरे बेटे या बेटी के साथ हो जाता तो? इस कल्पना मात्र से ही उसकी रूह सिहर उठती है। वो रो पड़ती है। और दुनिया को लगता है कि महिला कमजोर है। गोपाल मुस्कुराता है, मन ही मन कहता है कि “हे, विश्व के भ्रमित मर्दो! औरत दिल से कमजोर नहीं होती, वो तो बस ‘माँ’ होती है।”

 – Pushpender Singh Parmar

अभी के लिए सस्ता व असरदार इलाज ही अपनाओ।

​आज जो बात कहने जा रहा हूँ वह थोड़ी विवादस्पद है किंतु मुझे अज्ञानी मान कर एक बार जरूर पढ़ लें। 

जब इंसान जंगलों में रहता था, सदा नंगे पाँव विचरण करता रहता था। उस समय इंसान के सामने एक कठनाई आई। नंगे पाँव चलने में काटें, कीचड व गन्दगी एक बड़ी समस्या थी।  उसके पैरों में काटें लगना रोज़ की बात थी। इस समस्या के दो इलाज़ थे। 

(1) पहला यह कि इंसान संपूर्ण धरा पर कालीन बिछा दे।

(2) और दूसरा यह कि वो अपने पाँव में ही जूते पहने ले। 

इन दोनों उपाय में से पहला दीर्घकालीन व उच्च लागत का उपाय था। और दूसरा एक कारगर, कम लागत का व तुरंत आराम देने वाला उपाय था। यह बात तय हो गई कि इंसान ने तुरंत आराम देने वाला उपाय अपनाया। लेकिन वो पहले उपाय को भी नहीं भुला। काम उस पर भी चलता रहा। 

इंसान ने काटों से बचने के लिए अपने पांव में जूते तो पहन ही लिए पर पृथ्वी पर कालीन बिछाने का प्रोजेक्ट भी साथ साथ चलता रहा। क्योंकि यह एक बड़ा प्रोजेक्ट था इसीलिए काफी चरणों में चलता रहा। आज के दिन यह प्रोजेक्ट कई स्थानों पर पूर्ण हो भी गया है, किसी स्थान पर अभी वर्क इन प्रोग्रेस है, तो किसी किसी जगह अभी पहले चरण में ही है। पहले चरण में पक्की सड़के बनी, सड़कों पर काटें नहीं थे। फिर शहरों को ऐसे विकसित किया गया कि पेवमेंट इत्यादि सीमेंटेड हों, ताकि काँटेदार झाड़ ही पैदा ना हों। शहर में जहाँ हरियाली चाहिए होती थी वहां भी योजनाबद्ध तरीके से ऐसे पेड़ लगाए गए जिनसे काटें पैदा ना होते हों। 
आज दुनिया में न्यूजीलैंड एक ऐसा देश है जहाँ धरा पर कालीन बिछाने वाला काम पूरा हो गया है। अर्थात न्यूज़ीलैंड ने ऐसे शहर विकसित कर लिए हैं जहाँ पर काटें, कीचड़ व गन्दगी का नामोँ निशां नहीं है। इसलिए वहाँ लोग स्कूल, ऑफिस व सुपरमार्केट इत्यादि स्थानों पर बेयरफुट यानि नंगे पांव ही जाते हैं। धरती पर कालीन बिछते ही लोग वहां अपनी प्राकृतिक व स्वाभाविक आदत पर वापस आ गए और नंगे पांव ही घूमने लगे। 

अब आते हैं भारत देश की वर्तमान समस्या पर, ईव टीजिंग,  महिलाओं को छेड़ना, अश्लीलता आदि पर। इस समस्या के भी दो इलाज़ हैं। एक दीर्घकालीन व उच्च लागत का है व दूसरा तुरंत प्रभावी है। 

(1) पहला यह कि पूरे भारत के पुरुष वर्ग को महिलाओं की इज़्ज़त करना सीखा दो। कानून से नहीं बल्कि संस्कारों से पुरुषों को प्रतिबंधित कर दो। 


(2) दूसरा यह कि महिलाएं स्वयँ ही ऐसे स्थानों पर जानें से बचें जहाँ वर्तमान में उन्हें किसी अप्रिय घटना घटने की आशंका हो। अपने आचरण व वेशभूषा को स्थान व समयानुसार बदल लें। 

दूसरा उपाय तब तक के लिए है जब तक हमारा पहला बड़े वाला प्रोजेक्ट पूरा नहीं हो जाता। लेकिन पहला उपाय एक दीर्घकालीन उपाय है इसलिए अभी के लिए दूसरे उपाय को अपनाने में कोई समस्या नहीं होनी चाहिए। पूरे भारतीय पुरुष समाज को एक ही दिन में ठीक नहीं किया जा सकता। उसके लिए उन्हें बचपन से ऐसी शिक्षा देनी पड़ेगी, पाश्चात्य शिक्षा के साथ साथ भारतीय संस्कृति का मूल उन्हें समझना पड़ेगा। कूल मिला कर पुरुषों को उनकी जानवर वाली बेसिक इंस्टिक्ट को काबू में रखना सिखाना होगा। यह खुद में एक बड़ी बात है, एक बड़ा लक्ष्य है। प्रोजेक्ट पर काम चल रहा है। कुछ तरक्की भी हुई है लेकिन अभी पूर्ण नहीं है। 

जैसे न्यूज़ीलैंड में कालीन वाला काम पूरा हो गया है वैसे ही फ़िनलैंड, स्वीडेन व नॉर्वे आदि देशों ने अपना यह बड़े वाला प्रोजेक्ट पूरा कर लिया है। उन्होंने अपने पुरुष समाज को पूर्णतः सुधार दिया है। आज वहां महिलाएं रात के किसी भी समय कैसे भी कपडे पहन कर घूम सकती हैं। लेकिन भारत में इस सन्दर्भ में अभी काफी काम शेष है। ऐसे में महिलाओं को ही सावधानी बरतनी होगी। जैसे कच्चे रास्तों पर नंगेपाव नहीं चलना चाहिए वैसे ही भारतीय समाज के मैच्योर होने से पहले महिलाओं को पश्चिम की देखा देख व्यवहार नहीं करना चाहिये। 

इसीलिए माताओं व बहनो से अपील है कि जब तक हम सभी जगह कालीन ना बिछा दें कृपा तब तक के लिए जूते पहन लें। इसमें आपकी गलती नहीं है बस समाज के इस काम में हम संयुक्त रूप से पीछे हैं। 

– पुष्पेंद्र